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શનિવાર, 24 માર્ચ, 2018

चारणों की विभिन्न शाखाओं का संक्षिप्त परिचय

चारणों की विभिन्न शाखाओं का संक्षिप्त परिचय

आढ़ा
चारणों की बीस मूल शाखाओं  (बीसोतर) में “वाचा” शाखा में सांदु, महिया तथा “आढ़ा” सहित सत्रह प्रशाखाएं हैं। इसके अन्तर्गत ही आढ़ा गौत्र मानी जाती है। आढ़ा नामक गांव के नाम पर उक्त शाखा का नाम पड़ा जो कालान्तर में आढ़ा गौत्र में परिवर्तित हो गया। चारण समाज में महान ख्यातनाम कवियों में दुरसाजी आढ़ा का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है। इनका जन्म 1535 ईस्वी में आढ़ा (असाड़ा) ग्राम जसोल मलानी (बाड़मेर) में हुआ। इनके पिता मेहाजी आढ़ा तथा दादा अमराजी आढ़ा थे। ये अपनी वीरता, योग्यता एवं कवित्व शक्ति के रूप में राजस्थान में विख्यात हुए। इन्हें पेशुआ, झांखर, उफंड और साल नामक गांव एवं 1 करोड़ पसाव (1607 ई.) राज सुरताणसिंह सिरोही द्वारा प्रदान किये गये। राजस्थान में राष्ट्र जननी का अभिनव संदेश घर-घर पहुंचाने के लिए ये पूरे राजपूताना में घूमें। वीर भूमि मेवाड़ में पधारने पर महाराणा अमरसिंह ने इनका बड़ी पोल तक भव्य स्वागत किया था। इन्हीं के वंशजों में जवान जी आढ़ा को ही मेवाड़ में जागीर गांव मिले। इतिहास विशेषज्ञ डाॅ. मेनारिया के अनुसार दुरसाजी ने अपनी काव्य प्रतिभा से जितना यष, प्रतिष्ठा और धन अर्जित किया उतना किसी अन्य कवि ने नहीं प्राप्त किया। अचलगढ़ (माउन्ट आबू) देवालय में इनकी पीतल की मूर्ति स्थापित है जिस पर (1628 ई.) का एक लेख उत्तीर्ण है। संभवतः किसी कवि की पीतल की मूर्ति का निर्माण पूर्व में कहीं देखने को नहीं मिलता है। इनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में विरूद्ध छहतरी, किरतार बावनी एवं श्रीकुमार अज्जाजी नी भूचर मोरी नी गजजत मुख्य है।

आसिया
महाकवि बांकीदास आसिया (सन् 1761-1833 ई.)
सद्विद्या बहुसाज, बांकी था बांका बसु,
कर सुधी कविराज, आज कठीगो आसिया
विद्या कुल विख्यात, राजकाज हर रहस री
बांका तो विण वात, किण आंगल मन री कहां
महाराज मानसिंह (जोधपुर) 1761 ई. 1833 ई.

आसिया गोत्र की उत्पति जोधपुर के मूल गांव खाटावास से मानी जाती है। आशियो का मूल गांव लाकड़ थुम्ब है। यहीं से अन्यत्र जगह आसिया शाखा का विस्तार माना जाता है।
महाराणा उदयसिंह मेवाड़ जब कुंभलगढ़ में साहुकार के यहां बड़े हुए और उनका विवाह जालोर महाराज की पुत्री से किया गया। उक्त राजकुमारी के गुरू करमसी आसिया थे। जो कि भांड़ियावास के निवासी थे। महारानी के गुरू होने एवं बुद्धिमान, सर्वगुण सम्पन्न होने के कारण महाराजा उदयसिंह जी आसिया करमसी को अपने साथ मेवाड़ में ले आए प्रथम बार उदयसिंह जी ने करमसी आसिया को पसुंद ग्राम जागीर में दिया। बाद में ठाकुर बख्तराम जी के बेटे और जसवन्तसिंहजी के पोत्र वीरदान जी को पसुंद का परगना मिला। महाराणा भीमसिंह जी ने पुनः पसुंद व मोर्यो की कडिया, करमसिंह जी के पोते जसवन्तसिंह जी को तथा मेघटिया व मंदार गांव को महाराणा राजसिंह जी ने करमसिंह जी के वंशज खेतसिंह के पुत्र गिरधरसिंह जी को दिए।

अखावत
अक्खाजी बारहठ
अक्खाजी रोहड़िया बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए तथा शेरगढ़ परगने के अन्तगर्त भांडू गांव के निवासी थे। पांच महीने की अवस्था में इनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। तब मालदेव की पत्नि रानी झाली ने अक्खा को अपने स्तन का दूध पिला कर बड़ा किया। इनके समान आयु का ही रानी झाली का पुत्र उदयसिंह भी था। कालान्तर में जब उदयसिंह जी के विरूद्ध चारणों द्वारा आउवा में सत्याग्रह धरना दिया गया तब अपने सखा अक्खाजी को उदयसिंह ने सुलह के लिए लक्खाजी के पास जो कि चारणों के धरने का नेतृत्व कर रहे थे भेजा। तब लक्खा जी ने निम्न दोहा सुनाया।

अखवी आवंतां भांण दवादस भाणवत
तेज वदन तपतां, वाहर वीसोतर तणी।

जिस पर अक्खा आरहठ उदयसिंह का साथ छोड़कर स्वयं भी धरने पर बैठ गये। इसी जगत प्रसिद्ध सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने अपने लिए प्रेरणादायक माना तथा यहीं से उन्हें अहिंसा रूपी अस्त्र की प्रेरणा मिली।

बाटी
इस शाखा का नाम पिता के नाम के ऊपर प्रसिद्ध हुआ “कविवर कृष्णसिंह बारहठ” बाटी शाखा के गांव-जांतला, लिम्बोड मसोदिया (बांसवाडा, डूंगरपुर) कडीयावद (चितौडगढ) है। इनके अतिरिक्त गुजरात कच्छ में पालीताणा, मदाद, देढाणा, कलोल इत्यादि कई गांव है मारवाड में भी इस शाखा के गांव है। बाटी शाखा मूल रूप से गाडण, पांचोलिया, रतडा, सीरण आदि के अन्तर्गत मानी जाती है।

भादा
किसनाजी भादा (सन् 1533-1655 ई.)
भादा शाखा की मुल उद्गम शाखा भांचलिया है। इसके अन्तर्गत चांचड़ा सिंढ़ायच बांसग, वाळिया इत्यादि शाखाएं आती है।
मेवाड़ में भादा शाखाओं के गांव किसना जी भादा के पुत्रों को मिले थे। किसना भादा (1533 ई.) श्री नगर (अजमेर) के रहने वाले थे जो की पंवार राजपूतों की राजथानी थी। यहां का शासक पंचायण पंवार था, आमेर नरेश मानसिंह इन्हीं के प्रथानमंत्री थे, व श्रीनगर का शासन चलाते थे। अब्दुल रहीम खानखाना तथा किसना जी भादा अनन्य मित्र थे। जिसके कारण दिल्ली दरबार में इनकी पहुंच थी। परोपकारी एवं मानव सेवा के लिए बलिदान देने वालों में इनका नाम सदैव अविस्मरणीय है।
अकबर बादशाह के कहने पर राजा मानसिंह ने मेवाड़ पर हमला कर दिया। मानसिंह अपने लश्कर सहित पिछोला तक पहुंच गया। मानसिंह के साथ जग्गाजी बारहठ भी थे। तब राजा मानसिंह ने अपने अश्व को जगत प्रसिद्ध पिछोला में पानी पिलाते हुए गर्वोक्ति कही “हे अश्व तू छक कर पानी पी। या तो इस पिछोला पर राणा जोधा ने अपने अश्व को पानी पिलाया या फिर आज में पिला रहा हूं।” इस बात पर स्पष्टवक्ता जगाजी बारहठ ने तुरंत अपने स्वामी को भी फटकार कर ये दोहा सुनायाः-

मान मन अजंसो मती अकबर बळ आयाह,
जोधे जंग में आपरे, पाणां बळ पायाह
अर्थात् हे मानसिंह तुम अकबर के बल पर इतरा रहे हो जबकि राव जोधा ने अपने बल से अश्व को पानी पिलाया।

इस बात पर नाराज होकर मानसिंह ने तत्काल जयपुर रियासत के समस्त चारणों की जागीरें जब्त कर ली। पन्द्रह वर्ष तक जयपुर रियासत में चारणों का एक भी गांव नहीं रहा। तब किसनाजी भादा ने पुनः मानसिंह जी को अपनी बुद्धिमता व कवित्त्व शक्ति से प्रसन्न कर उन्हें जागीर बहाल करने पर विवश किया। मानसिंह ने यह शर्त रखी कि आपको मेरे यहीं रहना होगा। किसनाजी ने चारणों का भला सोच कर अपनी जागीर छोड़ मानसिंह के यहां बिना जागीर के रहना स्वीकार किया इसके पश्चात् मानसिंह ने इन्हें लसाड़ीया गांव व एक करोड़ पसाव दिया। कालान्तर में लसाड़ीया से ही निकलकर साकरड़ा भादाओं का ठिकाना बना तथा इसके बाद सरवाणीया, दुधालिया, महाराजा जगतसिंह जी के समय जागीर में मिले। बांसवाड़ा में नपाणिया भी भादा शाखा का मुख्य गांव है। भादा शाखा में इश्वरदान भादा, चंदु भादा भी अच्छे कवि हुए।

बोग्सा
लालदानजी बोग्सा
नराः शाखा के अन्तर्गत आने वाली मुख्य शाखाओं में “बोग्सा” गोत्र आती है, देवल, पायक, झीबा, राणा आदि कई शाखाएं इसके साथ मानी जाती है। बोग्सा गोत्र में कई कवि, विद्वानों के नामों में मुख्य विजयदान (प्रज्ञा चक्षु) मारवाड (मरवडी) गांव के लालदान जी बोग्सा, बांकीदान जी बोग्सा, सुरता जी। विजयदान प्रज्ञा चक्षु डीगंल-पिंगल भाषा विद्वान थे। इनकी स्मरण शक्ति विलक्षण होने से इन्हें प्रज्ञा चक्षु कहा गया है। मेवाड़ में इस शाखा के डींगरोल घातोल भाकरोदा गाँव है।

चांचडा
चांचडा शाखा की उद्गम मूल शाखा चडवा है, जिसके अन्तर्गत चउफवा, झुला, बरझड़ा आदि गोत्र आती है यद्यपि इसके बारे में ज्यादा ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती है, फिर भी यह अनेक गोत्रों का समुदाय रहा है। इस गोत्र के बारे में गुजराती में एक गीत लिखा मिलता है जिसमें इनकी अन्य ‘भाईपा’ गोत्र का वर्णन मिलता है-
काजा, चउवा आलग्ग ध्रारी, लागंडीआ,
कुंवारिया मूजड़ा छाछडा भाम, धनीया, भातंग
अरड सूभग झुला जणीया, वीझंवा
अेक, सुपार खरे, गावो ऐसी हरि नरसिंह
वागीया, धाया, नाया, राजवला वरसड़ा
गांगडीया चाटका राजा खोड खुंलडीया

देथा
जुगतीदान देथा (सन् 1855-1936 ई.)
देथा गोत्र भी प्राचीन गोत्र रही है, इसकी उदगम शाखा मारू है जिसमें किनीयां, सौदा, सुरताणीया, सीलगा कापल इत्यादि गोत्र आती है। हालांकि वर्तमान “देथा” शब्द से सभी परिचित है। राजस्थान ही नहीं वरन पूरे देश में विजयदान देथा के साहित्य की प्रशंसा है। यह सम्पूर्ण चारण समाज के लिए गौरवान्वित बात है।

दधिवाड़िया
महामहोपाध्याय कविराजा श्री श्यामलदास जी दधिवाड़िया

उदयनगर उन दिनन महं, सून्दर कविन समाज
सुकविन सर्व सिरोमनी, हो स्यामल कविराज
~~ठा. केसरी सिंह बारहठ

दधिवाड़ नामक गांव से इस गोत्र का नाम दधिवाड़ीया माना जाता है। जबकि मूल रूप से देवल (खांप) के चारण हैं। मेवाड़ महाराणा के सबसे विश्वस्ततम विश्वासपात्रों में प्रारम्भ से ही दधिवाड़िया चारण रहे हैं। खेमराज जी दधिवाड़िया जैसी विभूतियों से लेकर कविराजा महामहोपाध्याय श्यामलदास जी, कविराजा सगतीदान जी का, मेवाड़ राजघराने में विशेष रूतबा रहा है। मेवाड़ महाराणा जगतसिंह जी के प्राणों की रक्षा कर उन्हें नवजीवन प्रदान कर खेमराज जी ने महाराणा को अपना ऋणी बना लिया वही श्यामलदास जी जैसे विद्वान ने अपनी विद्वता से सम्पूर्ण राजपूताने में अपनी कीर्ति फैलाई। उनके द्वारा रचित वीर-विनोद के समक्ष तत्कालीन समय के किसी भी विद्वान की रचना नगण्य थी। इरान का यात्री यहां पर भ्रमण पर आया तब कविराजा श्यामलदास जी द्वारा इरान की भौगोलिक स्थिति का वर्णन सुनकर दंग रह गया। उसने महाराणा को कहा कि में स्वयं इरान का होते हुए भी इतना नहीं जानता जितना आपके कविराजा जानते हैं। यह एक छोटी सी घटना उदाहरण है उनकी विद्वता की।
कविराजा श्यामलदास जी उस समय चारणों की शिक्षा के बारे में चिंतित थे, उन्होंने चारणों की सुशिक्षा के प्रबन्ध के लिए महाराणा से कह कर चारण छात्रावास बनवाया। जिसके लिए चारण सदेव ऋणी रहेगा। मेवाड़ में दधिवाड़िया के धारता, खेमपुर, गोटिपा तथा ढ़ोकलिया इनकी जागीर गांव रहे हैं।

जगावत
जग्गा जी खिड़िया
“जगावत” शाखा का उदगम खिड़िया शाखा से माना जाता है। वीर पराक्रमी एवं उत्कृष्ठ कवि जग्गा जी के नाम पर इनके वंशज जगावत चारण कहलाने लगे। जग्गाजी ने रतलाम में रह कर वेचनिका राठोड रतनसिंह जी महेश दासोत री नामक ग्रन्थ की रचना की (1959 ई.) यह गद्यः पद्यः का एक अमूल्य ग्रन्थ है। जो बंगाल एशियाटिक सोसाइटी की ओर से डाॅ. टेसीटोरो द्वारा सम्पादित हुआ है। इसके साथ ही ये भक्ति रचनाएं भी करते थे। इनके काव्य में भक्ति-वीर काव्य श्रृंगार काव्य का अदभूत संगम है। इन्हें महाराजा रतनसिंह के उत्तराधिकारी रामसिंह जी ने आलोगिया, एकलगढ़, दलावड़ी गांव प्रदान किए। कालान्तर में दलावडी के स्थान पर सेंमलखेड़ा गांव दिया गया। चिरोला (बांसवाडा) घोड़ावद गांव के वंशजों का है। इन का स्वर्गवास रतलाम में हुआ। वही नरेशों के स्मारक छतरियों के पास शिवबाग में इनका दाह संस्कार किया गया जो इनकी राज-भक्ति को दर्शाता है।

कविया
कविराज श्री करणीदान कविया (सन् 1685 ई. लगभग)
कविया शाखा में जन्मजात प्रतिभा लेकर श्री करणीदान कविया आमेर राज्यान्तर्गत गांव डोगरी में अवतीर्ण हुए। इनके माता-पिता का नाम क्रमशः इतियाबाई एवं विजयराम था। इनकी जीवनधारा राजस्थान के अनेक राज्यों में कल-कल निनाद करती हुई उत्तरोत्तर गतिशील होती रही। ये संस्कृत, प्राकृत, डिंगल-पिंगल, ज्योतिष, संगीत, वेदान्त में प्रवीण थे। इनके द्वारा रचित ग्रन्थ सूरजप्रकाश, विरद श्रृंगार, यतीरासा एवं अभय भूषण प्राप्त होते हैं। जिनमें सूरजप्रकाश नामक ग्रन्थ में साढ़े सात हजार छंद हैं। कविराज ने तत्कालीन देशकालीन परिस्थिति के अनुसार कविताएं एवं इतिहास की मशाल लेकर अंधकार में भटकती हुई क्षत्रिय जाति का पथ प्रदर्शन किया। इनका अंतिम समय किशनगढ़ में व्यतीत हुआ। तथा वहीं इनकी जीवनलीला (1780 ई. लगभग) समाप्त हुई। यहां इनकी स्मृति में छतरी बनी हुई है।
तत्कालीन महाराज इनका कितना सम्मान करते थे यह इस दोहे से चरितार्थ होता है।

अस चढ़ै राजा अभो, कवि चाढ़ै गजराज।
पोहर हेक जळेव में मोहर हलै महाराज।।

खिड़िया
कृपाराम जी खिड़िया इस शाखा में महान कवि हुए जिनके द्वारा रचित राजीया रा दूहा राजस्थानी साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध हुए। इनका मूल निवास मारवाड़ में था लेकिन सीकर के राव राजा लक्ष्मणसिंह के पास ही यह जीवन पर्यन्त रहे। लक्ष्मणसिंह ने इन्हें ढ़ाणी प्रदान की जिसे कृपाराम की ढ़ाणी कहा जाता है। इनके द्वारा रचित कई नाम उपदंश विषयक दोहन संस्करण है।

लखावत
लक्खाजी बारहठ (सन् 1563 ई.)
लक्खाजी बारहठ के नाम से इनके वंशजों का नाम लखावत पड़ा। लक्खाजी मारवाड़ राज्यान्तर्गत नानणियाई के निवासी थे। इनके पिता का नाम नानण था। लक्खाजी की वाणी में एक अलग ही ओज व प्रभाव था। ये महान साहित्यकार, बुद्धिमान एवं राजनैतिक सूझबूझ के धनी थे। जिसके कारण ये अकबर के विशेष कृपा पात्र रहे। दिल्ली दरबार में इनके हस्तक्षेप एवं घनिष्ठता के कारण राजस्थान के समस्त राजा महाराजा इनसे मिलने के लिए लालायित रहते थे। लक्खाजी चारण जाति हितेषी स्वाभिमानी एवं सत्य का आग्रह करने वाले महान विद्वान थे। अकबर ने इन्हें मथुरा में बड़ी हवेली दी थी। जहां ये ठाठ बाठ से रहते थे। जोधपुर महाराज सुरसिंह ने इन्हें तीन गांव की जागीर प्रदान की। रेंदड़ी (सोजत), सींधलानडी (जेतारण), उफंचा हाड़ा, टेला व भेरूंदा (मेड़ता)। जिनके पट्टों की नकले वर्तमान में भी है। इनके द्वारा रचित “पाबु रासा” ग्रन्थ मिलता है। अकबर के कहने पर इन्होंने बेलि कृष्ण रूक्मणी की टीका मरू भाषा में लिखी।

अकबर मुख सूं अखियो रूड़ो कह दूं राह।
म्हैं दुनियां रो पातसा, लखो वरण पतसाह।।

मेहडू/जाड़ावत
महकरण मेहडू (जड्डा चारण)
महडू शाखा का नामकरण मेड़वा गांव पर प्रसिद्ध हुआ माना जाता है। महडू केसरिया, महियारीया सहित बारह शाखाओं का विवरण मिलता है। इस शाखा के गांव सरस्या, बाड़ी, देवरी, खेरी, संचयी, सालीया एवं कोकलगढ़ है। मेहडू शाखा में कविवर महकरणजी, कानदासजी, लांगीदानजी, वजमालजी जैसे कवि हुए। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं काव्य प्रतिभा से यश कीर्ति महकरण मेहडू को प्राप्त हुई। ये मूलतः सरस्या (तह जहाजपुर, भीलवाड़ा) के रहने वाले थे। इनकी काव्य प्रतिभा पर अकबर बादशाह भी मुग्ध थे। शरीर से भारी होने पर ये जाड़ा चारण नाम से विख्यात हुए। तथा इनके वंशज जाड़ावत/मेहडू कहलाने लगे। अकबर बादशाह के दरबार में प्रथम भेंट मे ही इन्होंने अपने भारी शरीर होने से उठ कर नजराना करने के विषय मे अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। इस पर इनको बैठे-बैठे ताजीम देने का अधिकार दिया गया। अकबर के नवरत्नों में से एक वजीर खानखाना मिर्जा अब्दुल रहीम ने इनकी विद्वता पर मुग्ध होकर ये दोहा कहाः-

धर जड्डा अंबर जड़ा जड्डा चारण जोय।
जड्डा नाम अल्लाहरां अवर नं जड्डा कोय।।

महियारिया
कविवर श्री नाथुसिंह महियारिया
महियारिया गौत्र का नाम महाराणा द्वारा महियार गांव जागीर में देने पर उक्त गांव के नाम से महियारिया हुआ। इनके पूर्वज गुजरात में सिद्धपुर पाठण राज्य के अन्तर्गत गणेसरा जागीर के स्वामी थे। वहां से इनका मेवाड़ में आगमन हुआ। महियारिया गौत्र में ख्यातनाम कवियों में श्री नाथुसिंह महियारिया का नाम विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। इनमें जन्मजात काव्य प्रतिभा थी। इनके द्वारा लिखित ग्रन्थों में वीर-सतसई अपने आप में वीर-रस की अनुपम कृति है। वीर-सतसई एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें कवि ने राजस्थान की वीरता व देशभक्ति के विशद मार्मिक प्रसंगों को आज की तथा आने वाली पीढ़ी के लिए एक गौरवानुभूति के रूप में सजाया।
इन्होंने बाल्य काल से ही कविता लिखना आरम्भ कर दिया जो सदैव अनवरत चलता रहा। इनकी काव्य रचना की विशेषता यह थी कि एक जगह बैठ कर नहीं करते थे वरन् चलते फिरते, कार्य करते, आखेट खेलते समय इनको स्वतः काव्य स्मरण हो आता। ये इनको उसी जगह कागज पर लिख देते। इनकी रचनाओं में हाड़ी शतक, झालामान शतक, गांधी शतक, करणी शतक इत्यादि प्रमुख है।

मिश्रण
महाकवि सुर्यमल्ल मिश्रण (विक्रम संवत 1872-1920 ई.)
चंडकोटि नामक कवि ने संस्कृत आदि छः भाषाओं को मिश्रित करके शास्त्रार्थ जीता। इस कारण मिश्रण कहलाये। जिसका अपभ्रंश “मीसण” हुआ।
कविवर कृष्ण सिंह जी बारहठ के अनुसारः मौरवी, इश्वरीया, जामनगर, बांकानेर (गजरात), लूणवास, कुण्डली, मोलकी, मेंरोप, झाकोल, खेरवाड़ा, मटकोला, हरणा (राजस्थान) मिश्रण शाखाओं के गांव है। महात्मा हरदासजी मिश्रण, हरीश जी मिश्रण, महाकवि श्री सूर्यमल मिश्रण, आनंद करमानंद, श्री खेत सिंह जी, नारायण सिंह इसी शाखा में हुए। सूर्यमल मिश्रण सम्पूर्ण साहित्य जगत के उद्भट वैटुष्य प्रकाण्ड पंडित एवं विलक्षण काव्य प्रतिभा के धनी थे। इनके समान बहुभाषाविज्ञ नाना विषयों के धुरंधर विद्वान एवं सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न कवि चारणकुल में न हुए न होंगे। भले ही यह कथन अतिशयोक्ति लगे मगर यह निराधार नहीं है। ये बूंदी नरेश महाराव रामसिंह के राजकवि थे। इनके पिता का नाम चंडीदान, माता का नाम भवानीबाई था। इनके द्वारा रचित वीर-सतसई के मूल में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ही प्रेरक पृष्ठभूमि रही। इन वीर रसपूर्ण प्रेरणादायी दोहों के द्वारा कवि ने तत्कालीन राजनैतिक संदर्भ में देश के सुप्त पुरूष को उद्भूत किया।

पालावत
श्री बालाबख्श पालावत
पालावत, “बारहट” शाखा के अन्तर्गत माने जाते हैं। इसी पालावत शाखा में बालाबख्श जी जैसे महान भक्त, दानी, परोपकारी चारण हुए थे, जिन्होंने काशी नगरी प्राचारिणी सभा को कई हजार रूपये दान दिए, जिसके सूद से “बालाबख्श, राजपूत चारण, पुस्तक माला” के अन्तर्गत राजपूत एवं चारणों के रचे हुए इतिहास तथा कविता विषयक ग्रन्थों का प्रकाशन होता है।
इनका जन्म जयपुर राज्यान्तर्गत हणुतिया ग्राम में हुआ, इनके पिता का नाम नृसिंहदास तथा बड़े भाई का नाम शिवबख्श था। ये सभी अच्छे कवि थे। इनकी अनेकों रचनाओं में 19 ग्रन्थ लिखे हुए हैं।
1) अश्व विधान सूचना
2) भूपाल सुजसवर्णन
3) षट शास्त्रा सारांश
4) सन्धोपासना अत्यानिका
5) क्षत्रिय शिक्षा पंचाशिका,
6) शोक शतक
7) नरूकुल सुयश
8) आसीस अष्टक
9) शास्त्रा प्रकाश
10) मान महोत्सव महिमा इत्यादि। मेवाड़ में पालावतों का गांव मण्डपिया (भीलवाड़ा) में है।

रतनू
रतना नामक पिता से यह शाखा प्रसिद्द हुई। इनके बुजुर्ग पुरोहित बसुदेवजी खेती किया करते थे। उनके सात बेटे थे। देवराज भाटी ने दुशमनों के खौफ से उनके पास आ कर कहा कि मुसलमान मेरे पीछे आते हैं। मुझको बचाओ। बसुदेवजी ने अपना जनेऊ और कपड़े उसको पहिना कर हल जोतने में लगा दिया। इतने में ही मुसलमान आये और अपने शिकार देवराज भाटी को पूछने लगे। बसुदेवजी ने कहा कि यहां तो मैं हूं या मेरे बेटे हैं, तीसरा कोई नहीं। मुसलमानों ने कहा खैर! तो तुम सब हमारे सामने शामिल बैठ कर खाना खा लो। बसुदेवजी ने 6 बेटों को तो दो दो करके तीन पांत में बैठाया और सातवें को जिसका नाम रतना था, देवराजजी भाटी के साथ बैठा कर खाना खिलाया। मुसलमान तो यह देख कर लौट गये मगर रतना को भाइयों ने गैर कौम के साथ खा लेने से अपने खाने पीने में शामिल न रखा। कुछ अरसे पीछे भाटी देवराज ने गया हुआ राज पा कर बसुदेवजी को अपना पुरोहित और रतना को अपना बारहट बनाया। यहीं से रतनू शाखा का आरम्भ हुआ।

रतनू, नाला तथा चीचा ये तीनो शाखाएं परस्पर भाई हैं।

कवि हमीरदान रतनू महाराजा लखपति सिंह के दरबार की शोभा थे। ये जोधपुर राज्यान्तर्गत घडोई ग्राम के निवासी थे और बचपन से ही कच्छ-भुज में रहते थे। इन्होने निम्नलिखित तेरह ग्रंथों की रचना की:
१) लखपत पिंगल
२) पिंगल प्रकाश
३) हमीर नाम माला
४) जदवंस वंशावली
५) देसल जी री वचनिका
६) लखपत गुण पिंगल
७) ज्योतिष जड़ाव
८) ब्रह्माण्ड पुराण
९) पिंगल कोष
१०) भागवत दर्पण
११) चाणक्य नीति
१२) भरतरी सतक
१३) महाभारत रो अनुवाद छोटो व बड़ो

रोहडिया बारहट
भक्त शिरोमणी कवि महात्मा ईसरदास बारहठ
महात्मा ईसरदास जी का जन्म भादरेस गांव में हुआ था। इन्होंने जीवन के प्रारम्भिक वर्ष जामनगर के नवाब के यहां बिताये। ईसरदासजी को जामनगर में अपार यश, धन एवं सम्मान ही नहीं मिला, प्रत्युत इनका काव्य-ज्ञान भी वहीं परिमार्जित एवं परिष्कृत हुआ। जाम साहब के दरबार में पिताम्बर भट्ट नामक एक राज पंडित रहते थे। जो संस्कृत के ज्ञाता एवं धर्म शास्त्र के धुरन्धर विद्वान थे। आरम्भ में ईसरदासजी और पिताम्बर भट्ट में पारस्परिक प्रतिद्वन्द्वता का भाव था। यह सुनकर की ऐसा होनहार कवि किसी राजा का गुणगान न कर हरि सुमिरन करे तेा उसकी प्रभिता का सच्चा सदुपयोग हो सकता है। ईसरदास जी का हृदय परिवर्तित हुआ और इन्होंने उनको अपना गुरू बना लिया फिर उनसे संस्कृत का ज्ञानोपार्जन कर आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन किया। वेद शास्त्रों के गम्भीर ज्ञान ने इन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र में गतिशील किया। इनके हृदय में सुसंस्कार पहले से ही विद्यमान थे अतः अवसर पाकर यह पल्लवित होते गए। ईसरदास अपने समय के एक उच्च कोटि के विद्वान कवि एवं भक्त ही नहीं थे। प्रत्युत एक चमत्कारवादी सिद्ध भी थे। इसीलिए लोक जीवन में लोग इन्हें “ईसरा परमेशरा” कहते हैं। एक बार सांगा राजपूत के यहां विश्राम लेते समय जब उसने अपना एक मात्र कम्बल भेंट स्वरूप ग्रहण करने के लिए प्रार्थना की तब ये कह कर चले गए कि लौटते समय अवश्य इस भेंट को लेकर जाऊंगा। इस बीच वेणु नदी को पार करते समय बाढ़ आ जाने से सांगा पशुओं सहित बह गया। बहते-बहते उसने जोर से चिल्लाकर तट पर खड़े ग्रामवासियों से कहा कि भाई मेरी मां से कह देना कि ईसरदास के लिए जो कम्बल रखा हुआ है, वह उन्हें लौटने पर अवश्य दे दिया जाए। लोटते समय सांगा को न पाकर ये तत्काल सांगा की जल समाधि के पास जाकर कहने लगे – तुम्हारी प्रतिज्ञा अनुसार में कम्बल लेने आया हूं। अतः आकर उसे पूर्ण करो। इतने में ही सामने से आवाज आई। आ रहा हूं! थोड़ी ही देर में सांगा पशुओं सहित आता हुआ दिखाई दिया और उसने इनके पैर पकड़ लिए। लगभग 40 वर्ष तक जाम साहब के पास रह कर वृद्धावस्था में यह अपनी जन्म भूमि भादरेस लौट आए और अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गुड़ा ग्राम के पास लूनी नदी के तट पर एक कुटीर बना कर रहने लगे। वहीं पर 80 वर्ष की अवस्था में इन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। भादरेस की जीर्ण कुटीर में आज भी चारण बंधु इन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वहां के पवित्र रजकण को मस्तक पर धारण करते हैं। वहां प्रातःकाल सदैव हरिरस का पाठ होता है। लोगों को विश्वास है कि ईसरा उन्हें आज भी उपदेश दे रहा है। दीवाली व होली पर्व पर जंगल में गांव के बाहर जहां इनके खेत थे, जाल वृक्ष में स्वतः दीपक जलते हैं। यह देखकर ही लोग होली मनाते हैं। महात्मा ईसर दास ने कई रचनाएं की जिनमें से ‘हरिरस’ एवं ‘हाला-झाला रा कुण्डलिया’ विशेष प्रसिद्ध है। अन्य रचनाओं में ‘छोटा हरिरस, ‘बाल लीला’, ‘गुण भागवत हंस’, ‘गरूड़-पुराण’, ‘गुण-आगम’, ‘निन्दा-स्तुति’, वैराट, देवियाण’ प्रमुख है।

सान्दू
मालोजी सान्दू
वाचाः शाखा के अन्तर्गत आढ़ा, सान्दु, महिया सहित सदर गौड़ माने है। जिसमें सान्दू शाखा भी एक है सान्दूओं का मेवाड़में हापाखेड़ी एक मात्र गांव है।
माला जी सान्दू इस शाखा के महान विद्वान कवि हुए विमानेर नरेश रायसिंह जी ने इन्हें लाख पसाव व भदोरा गांव प्रदान किया। अपने समय के प्रतिष्ठित कवि थे। महाराजा पृथ्वीराज वृत ‘बेलि किशन रूक्मणी री’ के निर्णायकों में ये भी एक थे। इनकी कई रचनाएं भी मिलती है।

सांयावत (झूला)
भक्त कवि सांयाजी (झूला)
चड़वा, शाखा के अन्तर्गत झुलाशाखा बरसड़ा शाखाए आती है। झुला गोत्र में सांयाजी नामक महानभक्त हुए उन्हीं के वंशज सांयावत कहलाते हैं।
सांयाजी झूला महान दानी, परोपकारी भक्त कवि थे। भक्त कवि सांयाजी झूला कुवाव गांव गुजरात के निवासी थे। इन्होंने अपने गांव में गोपीनाथ भादेर, मंठीवाला कोट, किला तथा बावड़ियां बनवाई थी। जीवन के अन्तिम वर्षों में ब्रजभूमि जाते वक्त मार्ग में श्रीनाथद्वारा में श्रीनाथ दर्शन करने गये। वहां इन्होंने सवा सेर सोने का थाल प्रभु के चरणों में धरा था। जो आज भी विद्यमान है। उस दिन से आज तक वहां तीन बार आवाज पड़ती है “जो कोई सांयावत झूला हो वो प्रसाद ले जावें”।
मृत्यु के अंतिम दिन मथुरा में एक हजार गाये ब्राह्मणों को दान दी तथा हजारों ब्राह्मण गरीबों को भोजन करवाकर हाथ जोड़कर श्री कृष्णचंद जी की जय कर इन्होंने महाप्रयाण किया। इनका लिखा हुआ “नागदमण” भक्ति रस का प्रमुख ग्रन्थ है|

सिलगा
श्री सांईदान सिलगा
सीलगा शाखा में सांईदान जी विद्वान कवि थे। जो कि झाड़ोल के निवासी थे। इनके पिता का नाम मेहाजठ था। इनका रचना काल 1652 ई. के लगभग था। इन्होंने एक ग्रन्थ रचना की जिसमें 277 पद है जिसे सवंतसार या वृष्टि विराम भी कहा जाता है।

सिंढ़ायच
भांचलिया नरसिंह भढ़ पुष्कर कियो पड़ाव।
विरद सिंहढायच बख्सियो राजा नाहर राव।।

भांचलियाः शाखा के अन्तर्गत ही सिढायंच शाखा मानी गई है। इसमें भादा, बासंग, उज्जवल शाखाएं भी आती है। नरहरिदास नामक भाचलिया (भादा) चारण द्वारा अधिक सिंह मारने पर “सिंहढायच” की पदवी दी गई। जिससे इनके वंशज सिंढायच कहलाते है। कहते हैं पुष्कर के निकट शेरों द्वारा गायें अधिक मारी जाती थी। इस पर नरसिंहदासजी भांचलिया ने शेरों को मारने का प्रण लिया तथा 100 शेरों को मारने पर जोधपुर महाराज द्वारा सिंहढायच की उपाधि दी गई। इन्हें प्रथम गांव मोगड़ा प्राप्त हुआ। तब वहां से मदोरा (नरसिंहगढ़, म.प्र.) जागीरी का गांव मिला। कालांन्तर में मण्डा, भारोड़ी (उज्जवल), ओसारा, मादड़ी इत्यादि गांव प्राप्त हुए।

सौदा
नरूजी बारहठ
मुगलों के हाथ चितौड़ चले जाने के बाद महाराजा हम्मीर अपने कुछ वफादार सरदारों के साथ द्वारिका की यात्रा पर निकल पड़े। गुजरात के खोड़गांव (चारणों की जागीर) में चखड़ा चारण की बेटी बरवडी जी (शक्तिरूप) से मुलाकात हुई। महाराजा ने अपने राज्य छिन जाने की सारी घटना बताई। तब बरवड़ी जी ने उन्हें द्वारिका की यात्रा को बीच में छोड पुनः केलवाड़ा जाने का कहां एवं साथ ही यह कहा कि चितोड़ पुनः तुम्हारे कब्जे में आ जाएंगा। बरवड़ी जी ने 500 घोड़े बिना कीमत अपने बेटे बरू के साथ महारजा की सहायता में भेजे। घोड़े प्राप्त कर हम्मीर ने बरू जी को अपने विश्वासपात्रों में लेकर अपना बारहठ (घोड़ों की सौदेबाजी एवं व्यापार करने से इन्हें सौदा बारहठ कहते है) बना केलवाड़ा के पास आंतरी सहित कई गांव जागीर में दिए। जिनमें रावछा, सोनियाणा, बीकाखेड़ा, पाणेर, पनोतिया, आदि सम्मिलित थे। ईस्वी सन् 1344 में बरू जी से सहायता प्राप्त कर महाराणा हम्मीर ने चितौड़ पुनः प्राप्त कर लिया एवं बरवड़ी देवी की याद में एक मंदिर चितौड़ के किले पर बनाया जो अन्नपूर्णा देवी के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।
वीर जैसा और कैसा बारहठ सोनियाणा (मेवाड़) के निवासी थे। जो हल्दीघाटी के युद्ध में 18 जून 1576 ईस्वी में अपने सभी स्वामी महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो मेवाड़ और चारण जाति को गौरवान्वित किया।
बरू जी के वंशज नरूजी, हाला जी एवं वेला जी को बाद में गिरडिया, केवलपुरा, करणपुर, वड़लिया, मेघटिया बरवाड़ा, सेणुन्दा एवं डिडवाणा आदि गांव जागीर में मिले। नरूजी ने अपने 20 विश्वासपात्रा सैनिकों के साथ मुगलों द्वारा जगदीश मंदिर की मूर्तियां खंडित करने आये ताज खां एवं रूहिल्ला खां से 1668 ई. में युद्ध किया एवं वीरगति को प्राप्त हुए। इनका स्मारक जगदीश मंदिर के पास स्थित है।

सुरतानिया
सूराजी
सूरा जी नाम पिता के नाम से यह शाखा सुरतानीयां मानी गई, एसा माना जाता है। इसकी मुल स्त्रोत शाखा मारू है। जिसके अन्तर्गत किनियां, कोचर, देथा, सौदा, सीलगा, घूंघरियां इत्यादि बीस शाखाएं आती है।

टापरिया
श्री सुरायची टापरिया
“टापरिया” एसी लोक मान्यता है कि गुजरात राज्य में करणदेव सोलंकी के समय मकवाणा शक्ति राणी थे। किसी समय राजमार्ग पर हाथी पागल हो तथा वो उन्माद मचाता हुआ चार बालकों को मारने के लिए उन्मत हुआ ऐसे मे माता जी ने गोखड़े में बैठे-बैठे ही हाथ लम्बा कर चारों चारण बालको को बचा लिया जिसमें एक बालक के सिर पर टापली मारी उसके वंशज टापरिया के नाम से जाने जाते है। मेवाड़ वागड़ मालवा में एक मात्रा गांव बड़वाई है। वीर पराक्रमी राणा प्रताप के साथ युद्ध में भाग लेने वाले सुराय जी टापरिया यही बडवाई (मेवाड़) के निवासी थे।

तुंगल
ठिकाना भूरक्या कला पो. बिनायका तह.बड़ी सादड़ी जिला चितौड़

वरसड़ा
वरसड़ा गोत्र प्राचीन मानी जाती है। तथा यह चडवा (चउवा) झुला, सहित कई अन्य प्रशाखाओं के भाईपे की शाखा है। इस शाखा में गुजरात के माण्डण भगत वरसड़ा हुए थे जो कि महात्मा ईसरदास के समकालीन थे।
वरसडा शाखा में रायसिंह बरसड़ा कवि के साथ ही इतिहास वेत्ता थे। ये मारवाड़ के पीचासणी के निवासी थे इनके द्वारा लिखा काव्य ग्रन्थ “शनिचर री कथा” उपलब्ध है इसके अतिरिक्त इनकी रचित अन्य छुटकर रचनाएं भी बताई जाती है।

:- नोंध अे माहिती कीसने टायपींग की हे मुजे मालुम नही पर जीसने भी की हें उसका बहोत बहोत आभार

जय माताजी

શુક્રવાર, 23 માર્ચ, 2018

शहीदे आझम ने अंजळी :- रचना : जोगीदान गढवी (चडीया)

23 मार्च  ..शहीदे आझम ने अंजळी.*

*हिंद जाया नुं हालरडु*..

पिता किसन सिंह अने मां विध्यावती ने ज्यारे पोताना खोळाना खुंदनार ने फांसी नी पेहला छेल्ली वखत मळवा जवानुं हशे..ई लाहोर जेल ने दरवाजे मां पोताना दीकरा ने छेल्ली वार मळवाना अबरखे उभी हसे अने खबर मळे के फांसी तो काल रात्रेज अपाई गई..अने मृत देह सोंपाणो होय..ई आंखो बंद करी ने सुतेला त्रण सावजो ..मां भारती ना भुलकां...सुखदेव राजगुर अने भगतसिंह...ऐनी बंध आखो जोई मां ने काळजे केवा घा वाग्या हशे...आ हिंद ने बिजा तो शुं ठबका देवा ? ,,.,

.            *|| हाला गाउं हिंद ना लाला ||*
.        *रचना : जोगीदान गढवी (चडीया )*
.           *राग:  बेटी बहुं बाप ने व्हाली*

लोट्यो तुंतो हिंद ना लाला, हैडा फाट गाउं हुं हाला
काळजडाने बोल ई काला, भोकें मारी छातीये भाला...टेक

निकळ्यो तो तुं निहाळ जावा ने, जलीया वाला जेल
दील दीधुं तुं देस ने तारा, मन मां नोंहतोय मेल
आग्युं घट सळगे आला..हाला गाउं हिंद ना लाला..||01||

खेतरे जई ने खेलतो तो तुं, हळ वावी हथीयार
जोई रहे केम सिखणीं जायो, मातृ भुमी ने मार
मंड्यो लईन हाथ मिशाला, हाला गाउं हिंद ना लाला..||02||

आटक्यो तुं अंगरेज ने माथे, बाटक्यो तुं बळवान
साटक्यो तें सारडील ने सेरी, जाटक्यो लीधेल जान
दागी त्रण गोळीयुं डाला..लीधूं तेंतो वेर ई लाला...||03||

दोसतारुं संग दीधीयुं तेतो, घारा सभा मां धिंह..
बोम फेंकी ने तुं बंकडा बोल्यो, हुं सिखणीं जायो सिंह
अंगरेजांय भर्य उचाला, हरखी तारा गाउं हुं हाला..||04||

थथरी गोरा ना काळजां कंप्या, पाडतां तुं  पड़कार
जुलतो लाहोर मांचडे जोया, अमे  हिंद माता नो हार
विरा त्रण लागीया वाला, हाला गाउ हिंद ना लाला..||05||

हिंद हैये तुं हीबकी हाल्यो, सहीद आजम नो सूर
जननीने जोगीदान जळेळ्या, पांपणे आंहुना पूर
ठबका शुं आ देस ने ठाला, हाला गाउं हिंद ना लाला..||06||,, .....

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हे भगतसिंह अमे तने याद करियें त्यां अमारी आंख्युं भिनी थई जाय छे..अमे केदी तारुं ऋण चुकवी सकस्युं?? हे महाक्षात्र  ..तुं स्वतंत्रता विरो मां सुर्य छे...तुंने कोटी कोटी वंदन छे..
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देवियांण :- भक्त कविश्री ईशरदासजी

देवियांण – भक्त कवि ईसरदासजी
छन्द- अडल
करता हरता श्रीं ह्नोंकारी
काली कालरयण कौमारी
ससिसेखरा सिथेसर नारी
जग नीमवण जयो जडधारी।1।
धवा धवळगर धव धू धवळा
क्रसना कुबजा कचत्री कमळा
चलाचला चामुंडा चपला
विकटाविकट भू बाला विमला ।2। 90
सुभगा सिवा जया श्री अंबा
परिया परंमार पालंबा
पिसाचणि साकणि प्रतिबंबा
अथ आराधिजे अवलंबा।3।
सं कालिका सारदा समया
त्रिपुरा तारणि तारा त्रनया
ओहं सोहं अखया अभया
आई अजया विजया उमया ।4।
छंद भुजंगी
देवी उम्मया खम्मया ईसनारी
देवी धारणी मुंड त्रिभुवन्नधारी
देवी सब्बदां रूप ओम रूप सीमा
देवी वेद पारक्ख धरणी ब्रहम्मा । 1।
देवी कालिका मां नमो भद्रकाली
देवी दूरगा लाघवं चारिताली
देवी दानवा काल सुरपाल देवी
देवी साधकं चारणं सिद्ध सेवी ।2।
देवी जख्खणी भख्खणी देव जोगी
देवी निर्मला भोज भोगी निरोगी
देवी मात जानेसुरी व्रन्न मेहा
देवी देव चामुंड संख्याति देहा ।3।
देवी भंजणी दैत सेना समेता
देवी नेतना तप्पना जय नेता
देवी कालिका कूबजा कामकामा
देवी रेणुका सम्मला रामरामा ।4।
देव मालळी जोगणी मत्त मेघा
देवी वेधणी सूर असुरां उवेधा
देवी कामही लोचना हामकामा
देवी वासनी मेर माहेस वामा । 5।
देवी भूतड़ा अम्मरी वीस भुजा
देवी त्रीपुरा भैरवी रूप तूजा
देवी राखसं धोम रे रक्त रूती
देवी दुज्र्जटा विक्कटा जम्मदूती । 6।
देवी गौर रूपा अखां नव्व निद्धी
देवी सक्कळा अक्कळा स्रव्व सिद्धी
देवी व्रज्ज विमोहणी वोम वाणी
देवी तोतला गंूगला कत्तियांणी । 7।
देवी चन्द्रघ्ज्ञंटा महम्माय चंडी
देवी वीहळा अन्नळा वाड्डवडडी
देवी जम्मघंटा वदीजंै जडंबा
देवी साकणी डाकणी रूढ सब्बा । 8।
देवी कट्टकां हाकणी वीर कंवरी
देवी मात वागेसरी महागवरी
देवी दंडणी देवबैरी उदंडा
देवी विज्जया जया दैतां विखंडा । 9।
देवी खेचरी भूचरी भद्र खेमा
देवी पद्मणी सोेभणी कलह प्रेमा
देवी जम्मणी मक्ख आहूति ज्वाला
देवी वाहिनी मन्त्र लीला विसाला ।10।
देवी मंगळा वीजळा रूप मघ्धे
देवी अब्बला सब्बला वोम अघ्धे
देवी स्रग्ंग सूं ऊतरी सिव माथे
देवी सगर सुत हेत भगिरथ्थ साथे।11!
देवी हारणी पाप श्री हरि रूपा
देवी पावनी पतितां तीर्थ भूपा
देवी पुन्य रूपं देवी प्रम्म रूपं
देवी क्रम्म रूपं देवी ध्रम्म रूपं ।12।
देवी नीर देख्यां अघ ओघ नासे
देवी आतमानंद हिये हुलासे
देवी देवता स्रब्ब तूं मां निवासे
देवी सेवते सिव सारूप् भासे।13।
देवी नाम भागीरथी नाम गंगा
देवी गंडकी गोगरा रामगंगा
देवी सर्सति जम्मनां सहरी सिद्धा
देवी त्रिवेणी त्रिस्थली ताप रूद्धा ।14।
देवी सिन्धु गोदावरी मही संगा
देवी गोमति घम्मला बाणगंगा
देवी नर्मदा सारजू सदा नीरा
देवी गल्लका तुंगभद्रा गंभीरा।15।
देवी कावेरी तपि करना कपीला
देवी सोण सतलज्ज भीमा सुसीला
देवी गोमगंगा देवी वोमगंगा
देवी गुप्तगंगा सुची रूप अंगा।16।
देवी निझरण नवे सो पदी नाला
देवी तोय ते तवां रूपं तुहाला
देवी मथुरा माईया मोक्षदाता
देवी अवंती अजोध्या अघ्घहाता ।17।
देवी कहां द्वारामती कांचि कासी
देवी सातपुरील परम्मा निवासी
देवी रंग रंगे आप रूपे
देवी घृत नैवेद ले दीप धूपे ।18।
देवी रग्त बंबाळ गळमाळ रूंडा
देवी मढ पाहारणी चंड मंुडा
देवी भाव स्वादे हसंते वकत्रे
देवी पाणपाणां पिये मद्य पत्रंे।19।
देवी सहस्रं लखं कोटीक साथे
देवी मंडणी जुद्ध मैखास माथे
देवी चापडे़ चंड ने मुंड चीना
देवी देवद्रोही दुहू धमी दीना।20!
देवी धूमलोचन्न हूंकार धोंस्यो
देवी जाडबा में रग्तबीज सोस्यो
देवी मोड़ियो माथ निसंभ मोड़े
देवी फोड़ियो संुभ जीं कुंभ फोडे़।21।
देवी संुभ निसंुभ दर्पान छळिया
देवी देव स्रग थापिया दैत दळिया
देवी संघ सूरांतणां काज सीधा
देवी क्रोड़ तेतस उच्छाह कीधा।22।
देवी गाजता दैत ता वंस गमिया
देवी नवे खंड त्रिभुवन तूझ नमिया
देवी वन्न में समाधी सरथ व्रन्नी
देवी पूजते आसपूर्णा प्रसन्नी ।23।
देवी वैस सुरथ्थ रा दीह वळिया
देवी तवन तोरा कियां सोक टळिया
देवी मारकण्डे महापाठ बांध्यो
देवी लगो तव पाय नो पार लाध्यो ।24।
देवी सप्तमी अटमी नो नूजा
देवी चैथ चैदस्स पूनम्म पूजा
देवी सर्सती लक्खमी महाकाळी
देवी कन्न विष्णु ब्रहम्मा कमाळी ।25।
देवी रघ्ग्त नीलमंणी सीत रंगं
देवी रूप अंबार विरूप् अंगं
देवी बाळ युवा व्रधं वेषवाळी
देवी विस्व रखवाळ वीसां भुजाळी ।26।
देवी वैस्णवी महेसी ब्रहम्माणी
देवी इन्द्राणी चन्द्राणी रनांरांणी
देवी नारसिंघी वराही विख्याता
देवी इला आधार आसूर हाता ।27।
देवी कौमारी चामुंडा विजैकारी
देवी कुबेरी भैरवी क्षेमकारी
देवी मृगेंस ब्रख्ख हस्ती मइखे
देवी पंख केकी गरूड़ धिरट पंखे ।28।
देवी रथ्थ रेवंत सारंग राजे
देवी विमाणं पालखी पीठ व्राजे
देवी प्रेत आरूढ पù
देवी सागरं सुमेरू गूढ सù ।29।
देवी वाहनं नाम कै वप्पवाळी
देवी खग्ग सूळधरा खप्पराळी
देवी कोप रे रूप मे काळजेता
देवी कृपा रे रूप् माता जणेता ।30।
देवी जग्त कत्र्ता र भत्र्ता संहरता
देवी चराचर जग्ग सब मे विचरता
देवी चार धामं स्थल अस्ट साठे
देवी पाविये एकसो पीठ आठे ।31।
देवी माइ हिंगोळ पच्छम माता
देवी देव देवाधि वरदान दाता
देवी गन्द्रपांवास अर्बद्द् गा्रमे
देवी थाण उडियाण समसाण ठामे ।32।
देवी गढ़े कोटे गरन्नार गोखे
देव सिन्धु वेला सवालाख सोखे
देवी कामरू पीठ अघ्घोर कुंडे
देवी खंखरे दु्रमे कस्मेर खण्डे ।33।
देवी उत्तरा जोगणीपर उजेणी
देवी भाल भरूअच्च भजनेर भेणी
देवी देव जालंधरी सप्त दीपे
देवी कंदरे सख्खरे वाव कूपे। 34।
देवी मेटलीमाळ घूमे गरब्बे
देवी काछ कन्नोज आसाम अंबे
देवी सब्ब खंडे रसा गीरिश्रंगे
देव वंकड़े दुर्गमे ठां विहंगे ।35।
देवी वम्मेर डंगरे रन्न वन्ने
देव थंबड़े लींबड़े थन्न थन्ने
देव झंगरे चाचरे झब्ब झब्बे
देवी अंबरे अंतरीखे अलंबे ।36।
देवी निर्झरे तरवेर नगे नेसे
देव दिसे अवदिसे देसे विदेसे
देवी सागरं बेठड़े आप संगे
देवी देहरे घरे देवी दुरंगे ।37।
देव सांगर सीप मे अमी श्रावे
देवी पीठ तव कोटि पच्चास पावे।
देवी वेलसा रूप् सांमद बाजे
देव बादळा रूप् गैणाग गाजे ।38।
देव मंगगळारूप तूं ज्वाळ माळा
देवी कंठळा रूप् तूं मेघ काळा
देवी अन्नलं रूप आकास भम्मे
देवी मानवां रूप् म्रतलोक रम्मे ।39।
देव पन्नगां रूप पाताळ पेसे
देवी देवता रूप तूं स्रग्ग देसे
देव प्रम्म रे रूप् पिंड पिंड पीणी
देवी सून रे रूप ब्रहाण्ड लीणी ।40।
देवी आताम रूप काया चलावे
देवी काया रे रूप आतम खिलावे
देव रूप वासन्त रे वन्न राजे
देव आग रे रूप तूं वन्न दाझे ।41।
देवी नीर रे रूप तूं आग ठारे
देवी तेज रे रूप तूं नीर हारे
देवी ज्ञान रे रूप तूं जग्त व्यापी
देवी जग्त रे रूप तूं धर्म थापी ।42।
देवी धर्म रे रूप सिव सक्ति जाया
देवी सिव सक्ति रूपे सत्त माया
देवी सत्त रे रूप तूं सेस मांही
देवी सेस रे रूप रे सिर धरा साही।43।
देवी धरा रे रूप खमया कहावे
देवी खम्मया रूप तूं काळ खावे
देवी काळ रे रूप उदंड वाये
देवी वायु जळ रूप कल्पान्त थाये।44।
देवी कल्प रे रूप कल्पान्त दीपे
देवी विष्णु रे रूप कल्पान्त जीपे
देवी नींद रे रूप चख विसन रूढी
देवी विसन रे रूप तंू नाम पूढी।45।
देवी नाभ रे कमळ ब्रळा निपाया
देवी ब्रह्म रे रूप मधुकीट जाया
देवी रूप मधुकीट ब्रह्म डराये
देवी ब्रह्म रे रूप विष्णु जगाये।46।
देवी विष्णु रे रूप जंघा वधारे
देवी मुकंुद रे रूप मधुकीट मारे
देवी सावित्री गायत्री प्रम्म ब्रम्मा
देवी साच तण मेलिया जोग सम्मा।47।
देवी सूनी रे दूध तें खीर रांधी
देवी मरकंड रूप तें भ्रांत बांधी
देवी मन्त्र मूलं देवी बीज बाला
देवी वापणी स्रब्ब लीला विसाला।48।
देवी आद अन्नाद ओंकार वाणी
देवी हेक हंकार ह्नींकार जाणी
देवी आप ही आप आपंा उपाया
देवी जोगनिद्रा भवं तीन जाया ।49।
देवी मन्नछा माइया जग्ग माता
देवी ब्रम्म गोविंद संभु विधाता
देवी सिद्धि रे रूप नव नाथ साथे
देवी रिद्धि रे रूप धनराज हाथे।50।
देवी वेद रे रूप तंू ब्रम्म वाणी
देवी जोग रे रूप मछन्द्र जाणी
देवी दान रे रूप बळराव दीधी
देवी सत्त रे रूप हरचन्द सीधी।51।
देवी रढ्ढ रे रूप दसकंध रूठी
देवी सील रे रूप सौमित्र तूठी
देवी सारदा रूप पींगल प्रसन्नी
देवी मांण रे रूप दुजोंण मन्नी। 52।
देवी गदा रे रूप भुज भीम साई
देवी साच रे रूप् जुहिठल्ल ध्याई
देवी कुन्ती रे रूप तें कर्ण कीधा
देवी सासत्रां रूप सैदेव सीधा।53।
देवी बांण रे रूप अर्जुण बन्नी
देवी द्रौपदी रूप पांचां पतन्नी
देवी पांच ही पांडवां परे तूठी
देवी पांडवी कौरवां परे रूठी।54।
देवी पांडवां कौरवां रूप बांधा
देवी कौरवां भीम रे रूप खाधा
देवी अर्जुणं रूप जैद्रथ्थ मार्यो
देवी जैद्रथ्थ रूप सौभद्र टार्यो ।55।
देवी रेणुका रूप तें राम जाया
देवी राम रे रूप खत्री खपाया
देवी खत्रियां रूप दुजराम जीता
देवी रूप दुजराम रे रग्त पीता।56।
देवी रग्त रे रूप तूं जग्त जाता
देवी जोगणी रूप तूं जग्त माता
देवी मात रे रूप तूं अमी श्रावे
देवी बाळ रे रूप तूं खीर धावं।57।
देवी जस्सुदा रूप कान्ह दुलारे
देवी कान्हा रे रूप तूं कंस मारे
देवी चामुंडा रूप खेतल हुलावे
देवी खेतला रूप नारी खिलावे । 58।
देवी नारि रे रूप पुरसां धुतारी
देवी पुरसां रूप नारी पियारी
देवी रोहणी रूप तंू सोम भावंे
देवी सोम रे रूप तूं सुधा श्रावे ।59।
देवी रूकमणी रूप तूं कान्ह सोहे
देवी कान्ह रे रूप तूं गोपि मोहे
देवी सीत रे रूप तंू राम साथे
देवी राम रे रूप तूं भग्त हाथे।60।
देवी सावित्री रूप ब्रùा सोहाणी
देवी ब्रù रे रूप तूं निगम वाणी
देवी गोरजा रूप तंू रूद्र राता
देवी रूद्र रे रूप तंू जोग धाता । 61।
देवी जोग रे रूप गोरख्ख जागे
देवी गोरखं रूप माया न लागे
देवी माइया रूप तें विष्णु बांधा
देवी विष्णु रे रूप तंे दैत खाधा। 62।
देवी दैत रे रूप तंें देव ग्रहिया
देवी देव रे रूप कै दनुज दहिया
देवी मच्छ रे रूप तूं संख मारी
देवी संखवा रूपा तूं वेद हारी। 63।
देवी वेद सुद वार रूपे कराया
देवी चारणं वेद तें वार पाया
देवी लक्खमी रूप तें भेद दीधा
देवी राम रे रूप तंे रतन लीधा। 64।
देवी दसरथं रूप श्रवणं विडारी
देवी श्रवणं रूप पितु मात तारी
देवी केकयी रूप तें कूड़ कीधा
देवी राम रे रूप वनवास लीधा। 65।
देवी मृग्ग रे रूप तें सीत मोई
देवी राम रे रूप पाराध होई
देवी बाण रे रूप मारीच मारी
देवी मार मारीच लखणं पुकारी।66।
देवी लख्खणं राम पीछे पठाई
देवी रावणं रूप सीता हराई
देवी सक्रारी रूप हनमंत ढाळी
देवी रूप हनमंत लंका प्रजाळी।67।
देवी सांग रे रूप लखणं विभाडे
देवी लक्खणं रूप घननाद पाडे
देवी खगेस रूप तें नाग खाधा
देवी नाग रे रूप हरसेन बाधा ।68।
देवी छकारा रूप तंे राम छळिया
देवी राम रे रूप दसकंध दळिया
देवी कान्ह रे रूप गिरि नक्ख चाडे
देवी नक्ख रे रूप ह्रणकंस फाडे ।69।
देवी नाहरं रूप ह्रणकंस खाया
देवी रूप ह्रणकंस इन्द्रं हराया
देवी इन्द्र रे रूप तूं जग्ग तूठी
देवी जग्ग रे रूप तूं अन्न बूठी।70।
देवी रूप हैग्रीव रे निगम सूस्या
देवी हैग्रीव रूप हैग्रीव धूस्या
देवी राहु रे रूप तें अमी हरिया
देवी विष्णु रे रूप तें चक्र फरिया।71।
देवी संकर रूप त्रीपूर वीधा
देवी त्रीपुरं रूप त्रीपुर लीधा
देवी ग्राह रे रूप तें गज्ज ग्राया
देवी गज्ज गोविन्द रूपे छुडाया । 72।
देवी दधीची रूप तें हाड दीधो
देवी हाड रो तख्ख तें वज्र कीधे
देवी वज्र रे रूप तें व्रत्र नास्यो
देवी व्रत्र रे रूप तें सक्र त्रास्यो।73।
देवी नारदं रूप तें प्रस्न नाख्या
देवी हंस रे रूप तत ज्ञान भाख्या
देवी ज्ञान रे रूप तूं गहन गीता
देवी कृष्ण रे रूप गीता कथीता ।74।
देवी बालमिक व्यास रूपे तूं कृतं
देवी रामायण पुराणे भागवतं
देवी काबा रे रूप तूं पाथ लूटे
देवी पाथ रे रूप भाराथ जूटे । 75।
देवी रूप अंधेर रे सूर गंजे
देवी सूरजं रूप अंधेर भंजे
देवी मैख रे रूप देवां डरावे
देवी देवता रूप तूं मैख खावे ।76।
देवी तीर्थ रे रूप अघ विषम टारे
देवी ईस्वरं रूप अधमं उधारे
देवी पौन रे रूप तूं गरूड़ पाडे
देवी गरूड़ रे रूप चत्रभूज चाडे। 77।
देवी माणसर रूप मुगता निपावे
देवी मरालं रूप मुगता तुं पावे
देवी वामणं रूप बळराव भाड़ंे
देवी रूप बळराव मेरू उपाडे़।78।
देवी मेरगिर रूप सायर वरोळे
देवी सायरं रूप गिरमेर बोळे
देवी कूर्म रे रूप तूं मेर पूठी
देवी वाडवा रूप तूं आग उठी ।79।
देवी आग रे रूप सुर असुर डरिया
देवी सरसती रूप तें तेथ धरिया
देवी घड़ा रे रूप अगसत्त दीधो
देवी अगस्तं रूप सामन्द पीधो। 80।
देवी समुदं्र रूप तंे हेम छळिया
देवी पांडवं हेम रे रूप गळिया
देवी पांडवां रूप तें भ्रांत भांगी
देवी भ्रांत रे रूप तूं राम लागी ।81।
देवी राम रे रूप तंू भगत तूठी
देवी भगत रे रूप वैकुंठ वूठी
देवी रूप बैकुंठ परब्रह्म वासी
देवी रूप परब्रह्म सब मे निवासी।82।
देवी ब्रह्म तूं विष्णु अज रूद्रराणी
देवी वाण तंू खाण तूं भूत प्राणी
देवी मन्नं तंू पवन तंू मोख माया
देवी क्रम्म तूं ध्रम्म तूं जीव काया ।83।
देवी नाद तूं बिन्दु तूं नव्व नि़ि़द्ध
देवी सीव तूं सक्ति तूं स्रब्ब सिद्धी
देवी बापड़ा मानवी कांई बूझे
देवी ताहरा पार तूं हीज सूझे । 84।
देवी तूंज जाणे गती गहन तोरी
देवी तत्त रूपं गती तंूज मोरी
देवी रोग भव हारणी त्राहि मामं
देवी पाहि पाहि देवी पाहि मामं । 85।
छप्पय
रगता सेता रणा, नमो मां क्रसना नीला
सीकोतरी आसुरी, सुरी सुसिला गरवीला
दीरघा लघु वपु द्रढा, सबेही रूप विरूपा
वकला सकला व्रजा, उपावण आप आपुण
घण पवण हुतासण सूं प्रबळ, चामुंडा वन्दू चरण
कवि पार तूझ ईसर कहें, कालीका जाणे कवण ।1।
घम घमंत घुघरी, पाय नेवरी रणंझण
डम डमंत डाकली, ताल ताळी बज्जे तण
पाय सिंघ गळ अड़े, चक्र झळहळे चउदह
मळे क्रोड तेतीस, उदो सुरियंद अणंदह
अदभूत रूप सकती अकळ, प्रंेत दूत पालतियं
गहगहे वार डमरू डहक, महंमाय आवतियं ।2।
चढे़ सिंघ चामुंड, कमळ हंूकारव कध्धो
डरो चरंतो देख, असुर भागियो अhवध्धो
आदि सक्ति आपडे, रूक वाहिये रमंता
खाळ रगत खळहळे, ढळे ढींगोळ धरंता
हींगोळराय अठ दस हथी, भ्रखे मैख भुवनेसरी
कवि जोड़ पाण ईसर कहे, उदो उदो आसपुरी।3।

चारण हुँ में :- रचना: पद्मश्री सुर्यदेवसिंह जी पालावत

चारण हूँ मैं

*ले.पद्मश्री ठाकुर सूर्यदेवसिंह जी पालावत*

इतिहासों ने पढ़ा,
रसों ने जिसको गाया
तलवारों की छौहों ने,
जिसको दुलराया,
वही कलम का धनी,
ज्ञान का कारण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||

शिव से लेकर शक्ति,
शक्ति का विश्वासी हूँ|
महाशक्ति में विश्वासों की
मैं गंगा हूँ, मैं काशी हूँ|
पूजित हिंगलाज व चावंड
स्थापित करणी माता आवड़
विदित गिरवरा, बैचर बरवड़,
खोडियार कामख्या तेमड़
इन्दर, सायर, सोनल, देवल
सैणी राजू बट्ट अर बल्लर|
महम्माय का कृत कृतज्ञ हूँ|
चरण धूल हूँ पुण्यनमन हूँ,
बांकीदास, उम्मेद, मुरारि,
सावल, दुरसा, जाड़ा, लखा|
लंघी काना सायां झूला
पिंगल हरदा कागा दूल्हा|
सूर्यमल बारू वीरों सा,
रचना, साहस और शौर्य की
त्रिवेणी का झरना हूँ मैं|
प्राप्त अधिकृत अधिकारों के
विरोध का धरना हूँ मैं|
जोरावर प्रताप केसरी,
तिल तिल विगलित तदापि प्रञ्चलित
अमर क्रान्ति का कर्ता हूँ मैं|
मारवाड़ की बुद्धि शिरा विञ्जी लालस सी
उज्ज्वल व ब्रदी गाडण सी|
फैली ज्ञान प्रखरता हूँ मैं|
मैं श्रद्धा का तीर्थ, आस्था का हूँ मंदिर,
रहा राज्य चाणक्य, सभा श्रृंगार,
सनातन धारण हूँ मैं|
भाषा पंडित प्रवण स्नेह का श्रावण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||
चारण हुूँ मैं।

अति अतीत के स्मरित विस्मरित,
घटनाओं का एकल लेखक|
रण प्रांगण के घोर युद्ध का,
गर्जक तर्जक अंकक मापक|
समय समय से लिखी जा रही,
विविध विधा का रूपक चित्रक|
ईसरदास प्रभृति सन्तों की,
भक्तमाल का मोती मानक|
पखाडों की महिमाओं का,
जगदम्बा का गाथा गायक|
उतर भारत चर्चित चिन्हित,
करणी माँ का अर्चक वन्दक|
चारू चरित उतम अन्तर्मन,
आदर्शों का शाश्वत सरजक|
काल-भाल पर अमिट उभरता,
अक्षर, सुन्दर, सत्य सार्थक|
अवतारों की पीढ़ी हूँ मैं,
सदाचार की सीढी हूँ मैं,
भावी का मैं पूर्व निमन्त्रण,
वर्तमान आमन्त्रण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||

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