ચારણત્વ

" આપણા ચારણ ગઢવી સમાજની કોઈપણ માહિતી,સમાચાર અથવા શુભેચ્છાઓ આપ આ બ્લોગ પર પ્રકાશિત કરવા માગતા આ વોટ્સએપ ન.9687573577 પર મોકલવા વિંનતી છે. " "આઈશ્રી સોનલ મા જન્મ શતાબ્દી મહોત્સવ તારીખ ૧૧/૧૨/૧૩ જાન્યુઆરી-૨૦૨૪"

Sponsored Ads

લેબલ कविओ સાથે પોસ્ટ્સ બતાવી રહ્યું છે. બધી પોસ્ટ્સ બતાવો
લેબલ कविओ સાથે પોસ્ટ્સ બતાવી રહ્યું છે. બધી પોસ્ટ્સ બતાવો

સોમવાર, 16 જાન્યુઆરી, 2017

कवि उम्मेदराम जी पालावत

कवी उम्मेदराम जी पालावत

एक बार अलवर के राव बख्तावर सिंह जी अपने साथ प्रवीण शिकारी लेकर जंगल में शिकार करने गए ! वहा उन्होंने एक सूअर को गोली मारी ,मगर वह घायल होकर भाग गया ! शिकारियों ने सूअर की बहुत तलाश की मगर उसका कोई पता नहीं चला !
    अलवर के मालखाने दरवाजे के बाहर एक चमेली का बाग था , जहाँ रसूल - शाही फ़क़ीर का एक तकिया था और वह फ़क़ीर एक करामाती औलीया पुरुष था ! वह घायल सूअर उस फ़क़ीर के तकिये पर चला गया ! सूअर को घायल देखकर फ़क़ीर बहुत नाराज हुआ तथा उसने सूअर को घायल करने वाले राजा के पेट में असहनीय दर्द चालू कर दिया ! राजा को इतना भारी असहय दर्द हो रहा था की यदि उसका शीघ्रता से कोई उपचार नहीं किया गया तो राजा के प्राण निकल जायेंगे ! इसी दौरान गुप्तचरों ने राजा को बताया की सूअर तो रसूल शाही फ़क़ीर के तकिये पर गया हे ! और उसको घायल देखकर वह बहुत नाराज हुआ तथा आपके पेट में ये दर्द कर दिया हे !
     तभी राजा ने कहलवाया की इसमें मेरा कोई कसूर नहीं हे , सूअर तो तकिये से बाहर बहुत दूर था वहां गोली लगने के पश्चात तकिये पर गया हे हमने तकिये के अंदर उस पर कोई गोली नहीं चलाई हे इसके बाद भी उनको कोई नाराजगी हे तो में क्षमा चाहता हूँ !
   राव की यह बात सुनकर फ़क़ीर और अधिक नाराज हुआ , उसने राजा को कहलवाया की यदि वे अपने प्राण बचाना चाहते हे तो अपने दोनों हाथ बांधकर और उन पर रुमाल डालकर मेरे तकिये पर उपस्थित होवे और अपनी डाढी से तकिये पर झाड़ू लगावे ! यदि ऐसा नहीं किया तो उन्हें कुछ समय बाद अपने प्राण छोड़ने होंगे !
    यह सुनकर राव बड़े परेशान हुए ! उन्होंने अपने घनिष्ठ सरदारों से कहा की क्या हिन्दुओ में ऐसा कोई देवता हे जो मुझे स्वस्थ करे और मेरी इज्जत बचावे !
     स्तिथि बड़ी विकट थी हिन्दू धर्म की सत्ता व् शक्ति का भी प्रश्न था राव मरणासन्न की स्तिथि में पहुच गये , इस पर हणोतिया ग्राम के चारण उम्मेदराम जी पालावत ने कहा की हिन्दुओ में भी देवी देवताओ की कमी नहीं हे यदि आप कहे तो में शक्ति करणी को चडाऊ जिरजाओं व काव्य द्वारा आव्हान करके आपके पेट दर्द ठीक करने की प्रार्थना करू ! राव बख्तावर सिंह ने कहा की माँ शक्ति करणी को अविलम्ब बुलाओ वरना मेरा अंत हो जायेगा !
       उम्मेदराम पालावत ने दीपक की ज्योति जोड़कर चडाऊ चिरजाओं व काव्य से करुण पुकार की भावपूर्ण प्रार्थना करना आरम्भ किया  ! कुछ ही देर में महल के बुर्ज पर एक चील पक्षी के रूप में आकर , शक्ति विराजमान हुई ! कवी ने राव से कहा की बुर्ज पर चील के रूप में शक्ति करणी पधार गई हे ! आप दर्शन कर अपना पेट दर्द ठीक करे ! राजा ने खड़े होकर शक्ति करणी को अनेकों प्रकार से प्रार्थना कर के पेट ठीक करने को कहा ! कुछ क्षण में राजा का पेट दर्द बिलकुल ठीक हो गया ! वे बड़े प्रसन्न हुए ! राव बख्तावर सिंह ने अपने सिपाइयो को आदेस दिया की अधिक से अधिक रसूल शाही फकीरों के नाक - कान काट ली जावे ! सिपाइयो ने तत्परता से काम करते हुए लगभग 700 रसूल शाही फकीरों के नाकों को काट लिया !
      राव बख्तावर सिंह ने माँ करणी से पूर्ण आस्था रखते हुए पच्चीस हजार रुपये की पूजन सामग्री देशनोक भेजी ! जिसमे एक जडाऊ पादुका , एक जोडी सोने के किंवाड , एक जडाऊ छत्र , एक सोने की चौकी , एक सोने की छड़ी भी शामिल थे ! पादुका की जोड़ी अब भी मंदिर के खजाने में रखी हुई हे ! किंवाड की जोड़ी मंदिर द्वार पर चड़ी हुई हे ! राव जीवन पर्यन्त तक शक्ति करणी के अटूट भक्त रहे !
 
   शक्ति करणी के उस चडाऊ काव्य के दो कवित उम्मेद राम जी के कहे हुए इस प्रकार हे ------

    | छप्पय|
चंदू वेगी चाल ! चाल खेतल वड चारण !
तोरेे हाथ त्रिशूल ! धजाबंद लोवड धारण !!
वीसहथी इणवार ! देर मतकर डाढाली !
हरो रोग हिंगलाज ! करो ऊपर महाकाली !!
लगाज्यो वेर, पल हेक, मत ! आवडजी री आंण सूं !
आखता सिंह चढ़ आवज्यो ! माता मढ़ देसाण सूं !!१!!

गुंगी,गैली आव ! आव बहरी वरदाई !
हाल, आकुळी आव ! आव करनी मेहाई !!
देवल वेगी दौड़ ! देर मतकर अनदाता !
चालराय झट चाल ! मढ सूं आज्यो मात !!
बावड निभांण जूना बिडद ! आवड जी री आंण सूं !
आखता सिंह चढ़ आवजो ! देवी गढ देसांण सूं !!२!!

      गणपत सिंह मुण्डकोशिया 9950408090

चारण कविओ की थोडी जाणकारी.

⚔ *चारण* *कवियों* *की* *कडवी सच्चाई, स्पस्ट बयानी और* *निर्भीकता* *के* *कुछ* *उदहारण*⚔
      प्राचीन काल से ही चारणों की बात को सत्य समझा जाता था ,रामायण में लंका दहन के पश्चात  श्री हनुमान जी को सीताजी की चिंता हुई तब का उल्लेख हे की चारणो के वचन पर ही हनुमान जी को संतोष हुआ की सीताजी सुरक्षित हे ! मध्यकाल में जब राजपूताने में छोटे - छोटे राज्य परस्पर विस्तार हेतु लड़ते रहते थे ! राजा की सत्ता  सर्वोच्च थी उनके आदेश के विरुद्ध कंही भी सुरक्षा संभव नहीं थी ! तब भी चारणो ने अपनी निर्भीक होकर सत्य बोलने की परम्परा को निभाया हे तथा राजाओ व ठाकुरों को उनके कर्त्तव्य पथ से विचलित होने पर प्रताड़ना की हे ! इसके हजारों उदहारण हे -----
*1*  - अकबर की सेना का नेतृत्व कर जयपुर नरेश मान सिंह ने महाराणा पर चढाई कर दी जब उदैपुर में अपने घोड़ो पर सवार होकर मान सिंह पिछोला झील पर पहुचे तब गर्वोक्ति में घोड़ो से कहा की अब संतुष्ट होकर पानी पियो क्यों की यहाँ जोधपुर के मालिक के अलावा  और किसी ने घोड़ो को पानी नहीं पिलाया हे इस पर जयपुर के ही कविराजा जो उस समय वहीं पर थे ने मान सिंह को खरी खरी सुनाते हुए निम्न दोहा कहा -
 
*मान* *मन* *अंजसो* *मती,* *अकबर* *बल* *आयाँह* *|*
*वो* *जोधो* *राठोड* *तो,* *(निज)* *भुजा* *पांण* *पायाह* *||*
        मान सिंह कविराजा की बात पर अत्यन्त कुपित हुए और कविराजा को वंहा से हटा दिया साथ ही पिछोला झील से ही एक फरमान जारी कर तत्कालीन जयपुर रियासत की समस्त चारणों की जागीरें जब्त करली ,जो सात वर्ष तक जब्त रही ! उसके बाद पुन: धरना देकर बहाल करवाया !
*2*  - राव चूँडा का बचपन बहुत कठिनाइयों में बीता और उन्हें अपना बचपन कलाऊ गाँव में चारणों के यंहा बिताना पड़ा ! कालांतर में उनकी शादी मंडोर के राजा इन्दा जाती के राजपूत में हो गयी और उन्हें मण्डोर दहेज़ में मिला !
    राजा बनने के बाद राव चूंडा अपने बचपन के आश्रयदाता चारणों को भूल गया और अपने राज वैभव में मस्त हो गया तब एक दिन कवी ने उसे खरी खरी सुनाते हुए ये दोहा कहा --
*चूंण्डा* *आवे* *चीत,* *काचर* *कलाऊ* *तणा* |
*भड़* *बैठो* *भयभीत,* *मंडोवर* *रे* *मालियां* ||
    किसी भी शासक को इतनी नग्न एवं कटु सत्य बात सीधी कह देना बहुत बहादुरी का कार्य था !
*3*  - महाराणा भीम सिंह मेवाड़ की पुत्री की शादी पर जब बहुत बवाल हो गया और मेवाड़ को संकटों का सामना करने की समस्या पैदा हो गई तब उन्होंने तात्कालीक संकट को दूर करने के लिए अपनी पुत्री को मार डालना ही उचित समझा तब चारण कवी ने उन्हें इन शब्दों से फटकारा --
*भीमा* *तू* *भाटो* *मोटा* *मंगरा* *मातलो*
   क्यों की कोई पत्थर (भाटो) दिल ईन्सान ही ऐसा कृत्य कर सकता हे ! तो एक राजा को ऐसी फटकार कोई चारण कवी ही लगा सकता हे ! जिसे जिंदगी से भी ज्यादा सच्चाई पसंद हो ! जंहा कही भी राजा अपने कर्तव्यपथ से विचलित हुआ या जूठी शान दिखाई, तत्काल कविराज ने उसकी आलोचना या प्रताडना करने में कंही कसर नहीं रखी !
*4*  - जोधपुर के इतिहास प्रसिद्ध महाराजा अजीतसिंह की हत्या उनके ही पुत्र बखतसिंह द्वारा की गई , इनकी भर्त्सना तत्कालीन चारण कवियों ने खूब की हे इस अमानवीय कृत्य के लिए  बखतसिंह को जीवन में कई बार चारण कवि [दलपत बारठ] की फटकार सुननी व सहनी पड़ी ---
*बखता* *बखत* *बाहिरा,* *क्यूं* *मारयो* *अजमाल* |
*हिंदवाणी* *रो* *सेवरो,* *तुरकाणी* *रो* *शाल* |1|
*प्रथम* *तात* *मारियौ,* *मात* *जीवति* *जलाई* |
*असी* *चार* *आदमी,* *हत्या* *ज्यौ* *री* *पण* *पाई* |2|
*कर* *गाठो* *ईकलास,* *वेग* *जय* *सिंग* *बुलायो* |
*मेटी* *धरम* *मरजाद,* *भरम* *गांठ* *रो* *गमायौ* |3|
*कवि* *अणाहुंत* *कैवा* *करे,* *धरा* *उदक* *लेवणधरी* |
*बखतसी* *जलम* *पायो* *पछे,* *किसी* *बात* *आछी* *करी* |4|
*5*  - एक बार जब जोधपुर व जयपुर के महाराजा पुष्कर पर मिले सभी सभासदों के साथ सभा जुड़ी हुई थी ! तब मान सिंह जयपुर ने जोधपुर कविराजा करणी दान जी कवीया से कहा की कविराज सा हम दोनों में से श्रेस्ठ कोन हे तब निर्भीक व सत्यवादी कविराज ने कहा --
*ईत* *जेपुर* *उत*  *जोधपुर,* *दोनों* *ही* *थाप* *उथाप*|
*कुरम* *मारयो* *दीकरो*, *कमधज* *मारयो* *बाप* ||
   जयपुर कच्छवाहा को कुरम व राठोड़ों को कमधज कहा जाता हे
*6*  - जोधपुर के गौरवशाली इतिहास में सबसे ज्यादा चमकने वाला नक्षत्र हे तो वह हे दुर्गादास राठोड  जिन्होंने अपने जीवन में त्याग व स्वामी भक्ति को नई ऊचाईयाँ दी किन्तु जब महाराजा अजीतसिंह ने उन्हें राज्य से निर्वासित कर दिया तब चारण कवी इस अन्याय को सहन नहीं कर सके और उन्हें सीधी फटकार लगाते हुए जालोर जिले के केर निवासी भभूत दान जी ने अजीत सिंह को जबरदस्त फटकारा क्यों की अजीत सिंह ने अपनी राजकुंवरी इन्द्र्कुंवर का डौला दिल्ली भिजवाया ताकि दिल्ली के बादशाह खुश हो सके कवी ने इस पर न केवल शब्द प्रहार किये बल्कि मारवाड़ छोड़ सूंधा के पर्वतो में जाकर सन्यासी हो गए --
*रौवे रजपूती डब डब नयणा देखले | मन री* *मजबूती अख विसरियो तू अजा* |1|
*कालच री कुल में कमंद राची किम या रीत* | *दिल्ली डोलो भेजने अबखी करी अजीत* |2|
*मरुधर रो मुंडो कालो किम किधो कंवर* |
*असी घाव ऊंडो अबखो मन लागे अजा* |3|
*रण रा रंग राता खाता साहा रे सरण | नित जोडया* *नाता अवसल नाह रेसी अजा* |4|
*ईन्दर कवंरी ने हाय भेजी हूसैन संग* | *मेहणी मरूधर ने ईतीहासादीधी अजा* |5|
*7*  - महाराजा अजीत सिंह द्वारा दुर्गादास के निर्वासन का समाचार जब मृत्यु सैय्या पर पडे समरथदान ने सुना तो बीमार कवी ने कर्तव्य पथ का पालन करते हुए निम्न दोहे अजीतसिंह को कहे --
*रखवाली कर राजरी पाळी अणहद प्रीत*|
*दुरगा देसां काढने अबखी करी अजीत*|1|
*समौ तो पलटण सील हे राज बदल जुग रीत*|
*देसी मेहणी देसडा आगमतनै अजीत*|2|
*8*  - जोधपुर कविराज बांकिदास आशिया तो स्पस्ट व् कटु सत्य कहने में जरा भी हिचकते नहीं थे ! उन्होंने महाराजा मानसिंह को कई बार खरी खरी सुनाई और कई बार राजा का कोपभाजन भी हुए मगर सत्य से विचलित नहीं हुए बांकिदास का बचपन रायपुर में बिता था तथा रायपुर ठाकुर ने ही उन्हें जोधपुर तक पंहूचाया था बाद में मारवाड़ के कविराजा बने ! एक बार रायपुर ठाकुर जोधपुर किले में दरबार में पंहुचे तो बांकिदास जी खड़े होकर उनका स्वागत करने लगे ,यह बात महाराजा को नागवार गुजरी उन्होंने बांकिदास से कहा आप मारवाड़ के कविराजा हे ! यह एक साधारण ठाकुर हे इनके सामने खड़ा होना मेरे बेठे हुए यह राजगद्दी की तोहीन हे ! तब बांकिदास जी ने निर्भीकता से यह दोहा कहा --
*माणी ग्रीखम मांय पोख घणां द्रुम पाळियो* |
*जीण रो गुण किम जय , अज घण बुंठा ही अजा* ||
*9*  - एक बार जोधपुर नरेश बखत सिंह जी अपने घोड़े को पानी पिला रहे थे साथ ही थपकी देकर बाप बाप कहकर उसे सहला रहे थे तब कविराज बांकिदास जी ने कहा --
*बापों मत कह बगतसी, कांपत हे कैकाण* |
*एकर बापों फिर कहयो, तो तुरंग तजेला प्राण* ||
पितृहन्ता बखत सिंह के लिए इससे ज्यादा चोट करने वाले शब्द और क्या हो सकते हे !
*10*  - मेवाड़ के महाराणा को अंग्रेजो ने " सितारे हिन्द " की ऊपाधी से नवाजा था इसके सम्मान में दरबार सजाय गया तथा सभी अमीर उमराव तथा अंग्रेजो के ओफिसर मौजूद थे और सभी गुणगान कर रहे थे मगर कविराजा चुप थे ! इस पर महाराणा ने कविराजा से कहा ऐसे मोके पर आप चुप क्यों हे कुछ तो फरमाइये ,कविराज ने कहा --
*आगे आगे बाजता हिंदवां हद रा सूर* |
*अब देखो मेवाड़ पति तारा विया हजुर*||
*11*  -महाराणा फ़तेह सिंह जी का दिल्ली दरबार में जाने हेतु प्रस्थान तथा बारठ जी के " *चेतावनी रा चूंगट्या* " लिखकर भेजना तथा फ़तेह सिंह का रेवाड़ी से लौट आना आधुनिक काल की जग विख्यात घटना हे ! इस जाति की निर्भीकता राजाओ के सामने ही नहीं वरन किसी भी राजसत्ता को उन्होंने नही बख्सा, जब कुंवर प्रताप  सिंह बारठ आसानाडा रेलवे स्टेशन जोधपुर पर गिरफ्तार कर लिए गऐ और अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स क्वीक लेंड उन्हें भय से व मार से नही डिगा सका तो प्रलोभनों से डीगाने की सोची ,प्रताप सिंह टस से मस नहीं हुए तो उन्हें भावनात्मक चोट करनी चाही और कहा तेरी माता तेरे लिए रो रही हे उसी वक्त उस चारण युवक के मुह से जो शब्द निकले वो इतिहास के पन्नो में स्वर्ण अक्षरों मे लिखे गए हे ! प्रताप सिंह ने निर्भीकता से कहा " *मेरी माँ रोती हे तो उसे रोने दो , मैं अपनी मां को हंसाने के लिए हजारो माताओ को नहीं रुला सकता* " और अंग्रेज ऑफिसर को कहा की बारठ से बात करने की तुजमे तमीज  नहीं हे तो यंहा से अपना मुह काला कर जाओ !
*12*  - राजा महाराजाओं के आपसी व्यवहार में जब किसी बात को सत्य की कसौटी पर कसना होता था तब कविराजा की साख उसमे डाली जाती थी ! मालदेव व भटियानी जी का प्रशंग इसका उदाहरण हे की महाराणी भटियानी ने स्पष्ट कह दिया था की में महाराजा का विश्वास नहीं करती कविराजा आप सही बात फरमावे , तब स्पष्टवादी कविराज आशानन्द जी चारण ने साफ कह दिया ---
*मान रखे तो पीव तज , पीव रखे तज मान* |
*दो दो गयंदन बंधसी , एक ही कमुठांण* ||
*13*  - जब राजस्थान मे अंग्रेज सत्ता के अधीन सभी राजा , महाराजा आ चुके थे तब उनके पास कोई अधिक कार्य करने को नहीं रहा तब ठाकुरों ने व सामन्तों ने अय्याशी करनी शुरू कर दी व प्रजा जनो को कष्ट देना शुरू किया तब साधारण चारण कवियों ने ऊन्हे फटकार लगाते हुए अनेक दोहे कहे जो आज जन सामान्य मे प्रचलित हें --
*रुळीयोडा रूळ रल रहया , मद चकिया माचंत* |
*धणियांणी  थारी  धरा  नुगरा  किम नाचंत* |1|
*ठाकर बाजो ठाकरां अवरां रा आधार* |
*कागमाळा रा कंवरडा मरीयोडा मत मार* |2|
*नित दारू नाडाह उपमा पायने उमगै* |
*जुलमी सै जाडाह गारत होसी गुमानियां* |3|
*लोई पीवो मत लाडलां ओ नह वाली वाट* |
*इक दिन पाणी उतरसी घर घर घाटो घाट* |4|
 भूल हेतू क्षमा और सुधार हेतु सुझाव आमन्त्रित 
*गणपत सिह चारण मुण्डकोशिया --9950408090*

મંગળવાર, 10 જાન્યુઆરી, 2017

भीमा जी आशिया.

सिद्ध पुरुष भीमा जी आशिया

मालजी आशिया के प्राप्त गाँव को किसी कारणवश भाऊ चौधरी श्राप देकर चले गये थे ! इसी कारण वेरिशाल जी सशंकित थे की उनके कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हो रहा हे ! इसलिए गाँव के दक्षिण में कुछ जमीन अपने भाइयो से मांग कर उस पर माँ करणी का छोटा सा थान बनाया तथा ओरण की जमीन छोड़ी और उसमे एक तालाब खुदवाया ! कुछ समय पश्चात् वेरीशाल जी को वि स 1640 में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तब उसका नाम भीमा आशिया रखा ! उससे संबधित वेरीशाल जी का कहा हुआ डिंगल का एक गीत जिसके कुछ अंश ---

' भीमो सुतन दियो भगवती , राजी हुव दैशाणे राय ||
कहिये ग़ीत जिसौ हिज किधो ,इण पुळ ऊपर वैरे आय ||

  शक्ति की अनुकम्पा से उत्पन्न भीमा आशिया एक प्रखर बुद्धि व बड़ी तेजोमय कान्ति वाला बालक था ! उसने मात्र बीस वर्ष की अवस्था में सिणधरी के रावल महेश दास भारमलोत से मुलाकात की और परगना मालाणी में वि स 1660 को रतेउ नामक ग्राम जागीर में प्राप्त किया !
     पिता ने भीमा का विवाह पडोसी गाँव रेवाडा में कर दिया ! भाग्य की प्रबलता से अपने ससुराल में सिद्ध व तपस्वी साधू जलंधरनाथ की सेवा का इन्हें अवसर मिला और जलंधरनाथ ने प्रसन्न होकर वि स 1663 को इन्हें रिद्धी सिद्धी प्रदान कर दी ! साधू के अपने कंथा से एक भगवा कपडा भीमा को दिया और कहा की मेरे नाम से प्रसाद बनाकर इस कपडे से ढककर रख देना ! फिर इस अखूट भोजन से चाहे पूरी मारवाड़ को जिमाना !
     वि स 1664 में भीमा आशिया ने सिवाना के राव से मुलाकात की और सिंवाची पट्टी के 140 गाँव को भोजन करवाने की आज्ञा चाही ! सिंवाची की इस दावत का सफल आयोजन कर सबको चकित कर दिया ! दूर दूर के परगनो में सिद्ध पुरुष भीमा आशिया की किर्ती फेलने लगी !
      भीमा आशिया वि.सं. 1666 में उदैपुर राणा अमर सिंह के पास मेवाड गए ! उन्होंने कवित्व शक्ति का प्रयोग करते हुए राजा को काव्य सुनाए !
       कवी की विद्वता व काव्य पाठ से राणा मन्त्र मुग्ध हो गए ! उन्होंने खड़े होकर कवी का सत्कार किया व उचित आसन प्रदान किया !
     भीमा आशिया राजा करण सिंह व जगत सिंह के शासन काल में भी उच्च शिखर पर रहे थे !
     भीमा आशिया ने कैलाशपुरी में मेवाड राणाओ के इष्ट देव एकलिंग नाथ के मंदिर के पास में देवी के मंदिर का निर्माण करने की अनुमति मांगी ! राणा ने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी ! वि स 1666 से 1670 चार वर्ष में देवी का मंदिर निर्माण संपन्न कर राणा अमर सिंह से इस मंदिर की प्रतिस्ठा का कार्य करने की अनुमति चाही ! इस प्रतिस्ठा उत्सव पर तमाम मेवाड को दावत दी जिसमे राज परिवार सहित सेना भी सम्मिलित थी ! मंदिर प्रतिस्ठा उत्सव पर दी गई इस दावत से न केवल राज परिवार परन्तु सुदूर प्रदेशो के लोग भी आवक रह गए ! भीमा ने इस मंदिर पर अपने हाथ से स्वर्ण कलश चड़ाया ! जिससे सम्बंधित यह दोहा प्रचलित हे --

आज उदैपुर आय ! कुण थारी समवड करे !
करतां भीम कड़ाव ! इंडो चढायो आशिया !!

       दुसरे दिन राणा कैलाशपुरी से उदैपुर शहर तक 13 मील तक पेशकदमी में महल तक साथ चले और उनके स्वागत में रास्ते भर में तोरण द्वार बनाये ! कवी की पूजा की ! आभुषणो से अलंकृत कर लाख पसाव व चार गाँव सांसण के रूप में भेट कर ठाकुर के पद से विभूषित कर मेवाड में एक कुर्सी इनकी बैठक के लिए सुरक्षित की गई  !
  इस विराट प्रतिस्ठा आयोजन के लिए व्यंजन हलवा , पुडी , लापसी इत्यादि बनाकर जलंधरनाथ के दिए उस कपडे से ढककर रख दिया ! फिर राणा अमर सिंह को सपरिवार भोजन करने को बुलाने के लिए भीमा आशिया उनके पास राजमहल में गया !
    राजस्थान के दूर दराज के रावळ , मोतिसर व चारण सरदार भारी मात्रा में इस अद्वितीय दावत में सम्मिलित हुए थे ! इतने विराट आयोजन को असफल बनाने के लिए भीमा के विरोधी लोगो ने एकलिंग जी के मंदिर के पुजारी को कुछ प्रलोभन देकर समझाया की तुम राणा को इस दावत में भोजन करने से रोक दो ! राणा को कहना की आप सपरिवार चलकर इतने विशाल जन समूह में बैठकर एक चारण के यहां भोजन करोगे तब आपका राणा का पद जाता रहेगा ! इस प्रकार विधिवत समझाकर पुजारी को राजमहल में भीमा के जाने से पहले भेज दिया !
   भीमा आशिया राणा को बुलाने के लिए उनके पास गया तो पुजारी ने राणा का सपरिवार वहा जाकर भोजन करना राणा पद के विपरीत बताया और सुजाव दिया की समस्त राज परिवार के लिए भोजन यंहा महल में पहुचाया जावे ! अकस्मात् भीमा के सफल आयोजन पर असफलता का भारी ज्वार उमड़ आया ! किये गए पुरे कार्य पर पानी फिरने लगा  ! चारण मातृ शक्ति का उपासक हे और विपत्ति में उसी का संबल प्राप्त होता हे ! परन्तु आज चारण भीमा आशिया के सामने मतृशक्ति नहीं -- एकलिंगनाथ अर्थात शिव स्वरुप के कृपा की आवश्कता थी ! पुजारी के कथन के समर्थन में मंत्रिमंडल के सदस्यों में से भी एक दो ने सहज भाव से इसका समर्थन किया !
    स्थिति बड़ी विकट थी ! भीमा आशिया ने आँखे बंद कर ध्यानाअवस्था में जाकर जलंधरनाथ से साक्षात्कार किया ! फिर राणा से मुखातिब होकर कहा की आप मेरे साथ चलिए ! पहले एकलिंगनाथ जी को थाल परोसना हे ! वे प्रभु स्वयं भोजन करेंगे उसके पश्चात् हम सब उस प्रसाद को ग्रहण करेंगे ! फिर पुजारी से कहा की आप नाथ जी के पुजारी हे ! एकलिंगजी के मंदिर में आप भी उनको भोग लगाने के लिए अपनी तरफ से प्रसाद रख देना ! यह आयोजन एकलिंगजी की कृपा व उनके आदेश से किया गया हे ! में अल्पज्ञ तो उनका निमित्त मात्र हु , यह आयोजन मेरी तरफ से नहीं , उस प्रभु शिव की तरफ से हे !
       भीमा आशिया के इस कथन पर सभी कींकर्तव्यविमुढ होकर रह गए ! परन्तु पुजारी मंद मंद मुस्कान के साथ प्रसन्न था कि न तो एकलिंगनाथ जी की मूर्ति भोजन ग्रहण करेगी और न इनका आयोजन सफल होगा !
     भीमा आशिया ने शिव और जलंधरनाथ की स्तुति की और थाल सजाकर मंदिर में रखा ! पुजारी ने भी अपनी और से घी - गुड की एक कटोरी थाल के पास में अपनी और से रख दी ! गर्भगृह में मूर्ति के आगे पर्दा डाल दिया !
     राणा अमर सिंह , उसका समस्त मंत्रिमंडल , विद्वान चारण व नगर के गणमान्य सेठ - साहूकार इत्यादि का विशाल हुजूम इस घटना के साक्ष्य में आश्चर्य में अभिभूत होकर खड़े थे की आज एकलिंगनाथ जी की मूर्ति इस भोज्य पदार्थ को साक्षात् ग्रहण करेंगे ! कुछ समय के बाद बर्तनों के बजने की आवाज आई ! मूर्ति के आगे से पर्दा हटाकर देखा तो भीमा आशिया द्वारा परोसे गए थाल की भोजन सामग्री देव स्वरुप ने ग्रहण कर ली थी, थाल खाली था !  परन्तु पुजारी के हाथ से रखी प्रसाद ज्यो की त्यों कटोरी में पड़ी थी !
     राणा स्वयं ने श्री एकलिंग भगवान व भीमा आशिया का जयघोष किया ! उसके साथ ही उपस्तिथ गणमान्यो के जयघोष से मेवाड की धरा व अरावली पर्वतमाला गर्ज उठी  ! भीमा आशिया के साथ एकलिंग मंदिर द्वार से राणा अन्य समस्त सिरदारो के साथ भोजन शाला में गए ! बड़े ठाट के साथ राणा अमर सिंह ने भोजन ग्रहण किया और सन्देश भेजकर समस्त राज परिवार को भोजन शाला में बुला कर  भोजन करवाया !
     उस विशाल गोट में उस ज़माने में 5 लाख लोगो ने वहा भोजन ग्रहण किया था ! वहा लोगो के उपयोग में आने वाले जल प्रवाह से इतना कीचड़ बन गया था की हाथी का भी उसमे से निकलना संभव नहीं था !
   विरोधियो ने अभी तक हार नहीं मानी थी ! 80 मोतिसरो को उन्होंने फूलगर ( ऊनि स्वेटर ) भेट देने के बहाने रोक कर रखा था ! विरोधियो की मनसा थी की इन्हें भोजन शाला बंद होने के बाद ही यहाँ से भोजन के लिए रवाना करेंगे तब तक भीमा भोजन कर लेगा फिर तो भोजन बढ़ना बंद ही जायेगा ! मगर भीमा अपने ईस्ट बल के प्रभाव से कुछ ससंकित था , उसने शाम होने पर भी भोजन नहीं किया था ! सेवको द्वारा भोजन के लिए आवाज लगाई तब उन 80 मोतिसरो को  एक साथ भोजन के लिए भेज गया ! परन्तु सिद्धीया प्राप्त भीमा ने भोजनशाला बंद होने पर भी ठाट से भोजन कराया ! तब भीमा आशिया ने विलम्ब का कारण पूछा तो उन्होंने सत्य बात प्रकट कर दी ! भीमा आशिया ने कहा की आप एक फूलगर पर बिक गए , आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था ! खेर कोई बात नहीं अब आप प्रत्येक मोतिसर एक एक घोड़ी भेट स्वरुप लेकर जावे ! भीमा ने उन सबको 80 घोडिया देकर विदा किया !
   भीमा आशिया अत्यंत उदारमना व बहुत बड़े दानी थे ! इसलिए इनकी दानवीरता के कारण इन्हें भीम करण अर्थात कर्ण के समान दातार माना गया हे ! गंगा के किनारे स्वर्ण दान करने के सम्बन्ध में इनका यह दोहा बड़ा प्रख्यात हे ----

सितर मण सोनो दियो ! कर कर कंचन काप !
भागीरथ रे चोतरे ! भीम वेरावत आप !!

  🏼 गणपत सिंह मुण्डकोशिया -9950408090

Featured Post

ચારણ સમાજનું ગૌરવ શ્રીજયરાજદાન ગઢવી સાહેબ

અભિનંદન સંદેશ "સમગ્ર ચારણ-ગઢવી સમાજનું ગૌરવ અને કર્મનિષ્ઠ પોલીસ અધિકારી, આદરણીય જયરાજસિંહ ગઢવી સાહેબને પી.એસ.આઈ. (PSI) થી પ...